
सागर।वंदे भारत लाइव टीवी न्यूज रिपोर्टर सुशील द्विवेदी 8225072664 * पान मसाला खरीदने वाले लोगों को आने वाले दिनों में इसकी पैकेजिंग बदली हुई नजर आ सकती है. भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने पान मसाला की पैकेजिंग को लेकर नए नियम लागू किए हैं. ये प्रावधान 10 अगस्त 2026 से प्रभावी हो गए हैं. नए नियमों के तहत पान मसाला की पैकिंग में कई तरह के प्लास्टिक और सिंथेटिक सामग्री के इस्तेमाल पर रोक लगाई गई है. नए नियमों के मुताबिक पान मसाला की पैकेजिंग में पॉलीएथिलीन, पॉलीप्रोपिलीन, पॉलीएस्टर, PVC समेत अन्य सिंथेटिक पॉलिमर और को-पॉलिमर के इस्तेमाल की अनुमति नहीं होगी. इसके अलावा लैमिनेट, एल्युमिनियम फॉयल और मेटलाइज्ड लेयर वाली पैकेजिंग पर भी प्रतिबंध लागू किया गया है. इस बदलाव के बाद कंपनियों को मौजूदा पैकेजिंग व्यवस्था में बड़े स्तर पर बदलाव करना पड़ सकता है.नए प्रावधानों में पान मसाला की पैकेजिंग के लिए कागज, पेपर बोर्ड, सेलूलोज और प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त अन्य सामग्री के इस्तेमाल की अनुमति दी गई है. इसके अलावा पान मसाला को टिन या कांच के कंटेनर में भी पैक किया जा सकेगा. इसका मतलब है कि बाजार में आने वाले नए पैकेट मौजूदा प्लास्टिक-आधारित पैकेटों से काफी अलग दिखाई दे सकते हैं. पैकेजिंग में बदलाव का सीधा असर पान मसाला बनाने वाली कंपनियों की लागत पर पड़ने की संभावना है. कंपनियों को नए कच्चे माल की व्यवस्था करने के साथ पैकेजिंग मशीनरी और उत्पादन प्रक्रिया में भी बदलाव करना पड़ सकता है. कागज, पेपर बोर्ड, सेलूलोज, टिन और कांच जैसी वैकल्पिक सामग्रियों के इस्तेमाल से उत्पादन और पैकेजिंग खर्च बढ़ सकता है. यदि कंपनियों की लागत बढ़ती है, तो इसका कुछ असर उत्पाद की कीमतों पर भी पड़ने की संभावना है. प्लास्टिक आधारित पैकेजिंग की जगह दूसरी सामग्री इस्तेमाल किए जाने से उत्पाद की सुरक्षा और उसकी शेल्फ लाइफ को लेकर भी कंपनियों के सामने नई चुनौती आ सकती है. खासकर नमी, हवा और परिवहन के दौरान उत्पाद को सुरक्षित रखने के लिए पैकेजिंग तकनीक में बदलाव जरूरी होगा. अगर नई पैकेजिंग में उत्पाद को लंबे समय तक सुरक्षित रखना मुश्किल होता है, तो कंपनियों और सप्लाई चेन से जुड़े कारोबारियों को स्टॉक मैनेजमेंट पर ज्यादा ध्यान देना पड़ सकता है. पैकेजिंग में बदलाव का असर सिर्फ निर्माताओं तक सीमित नहीं रहेगा. थोक कारोबारियों और खुदरा दुकानदारों को भी नए पैकेटों के भंडारण और बिक्री की व्यवस्था के अनुसार बदलाव करना पड़ सकता है. अगर उत्पाद की शेल्फ लाइफ या पैकेजिंग लागत में बड़ा बदलाव आता है, तो कंपनियां और व्यापारी अपने स्टॉक की मात्रा कम रख सकते हैं. वहीं, बढ़ी हुई लागत का असर आखिरकार ग्राहकों तक भी पहुंच सकता है,





